टाटा ट्रस्ट्स के भीतर ट्रस्टियों के कार्यकाल और कानूनी पेचीदगियों को लेकर चल रहा विवाद अब एक नए मोड़ पर आ गया है। महाराष्ट्र सरकार के हालिया अध्यादेश के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि ट्रस्ट के ढांचे में तत्काल बड़े बदलाव होंगे, लेकिन ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार टाटा ट्रस्ट्स ने इन बदलावों को फिलहाल टालने का फैसला किया है।
कानूनी पेचीदगियों में उलझा अध्यादेश
महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स (संशोधन) अध्यादेश, 2025 की धारा 30A(2) के तहत स्थायी ट्रस्टियों की संख्या को कुल क्षमता के एक-चौथाई (25%) तक सीमित कर दिया गया है। टाटा ट्रस्ट्स के भीतर 'सर रतन टाटा ट्रस्ट' (SRTT) और 'टाटा एजुकेशन एंड डेवलपमेंट ट्रस्ट' (TEDT) जैसे निकायों में आधे से अधिक ट्रस्टी स्थायी दर्जे वाले हैं।
कानूनी जानकारों के बीच मुख्य बहस इस बात पर है कि क्या यह नियम पिछली तारीख (Retrospective) से लागू होगा या केवल भविष्य की नियुक्तियों (Prospective) पर। टाटा ट्रस्ट्स को मिली कानूनी सलाह के अनुसार, अध्यादेश में यह स्पष्ट नहीं है कि यह मौजूदा नियुक्तियों पर तुरंत प्रभावी होगा, इसीलिए उन्होंने स्थिति स्पष्ट होने तक बदलावों को रोकने का निर्णय लिया है।
नियुक्तियों पर उठ रहे सवाल
यह पूरा मामला तब और गरमा गया जब मेहली मिस्त्री ने ट्रस्टियों की नियुक्तियों में प्रक्रियागत उल्लंघन और हितों के टकराव जैसे गंभीर आरोप लगाए। मिस्त्री ने 'सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट' (SDTT) के कामकाज की निगरानी के लिए एक प्रशासक नियुक्त करने की भी मांग की है।
महत्व: टाटा ट्रस्ट्स की टाटा संस में 66% हिस्सेदारी है, जिसका अर्थ है कि ट्रस्ट के भीतर होने वाला कोई भी निर्णय देश के सबसे बड़े औद्योगिक घराने के नियंत्रण को प्रभावित कर सकता है।
प्रमुख चुनौतियां और आगे की राह
- बोर्ड के फैसलों की वैधता: यदि अध्यादेश को पिछली तारीख से लागू माना जाता है, तो वर्तमान बोर्ड द्वारा लिए गए निर्णयों की कानूनी वैधता पर सवाल उठ सकते हैं।
- अधिकारियों का रुख: हालांकि अभी तक किसी सरकारी एजेंसी ने आधिकारिक पूछताछ नहीं की है, लेकिन टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि वे किसी भी स्पष्टीकरण के लिए तैयार हैं।
- कानूनी विशेषज्ञों की राय: कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि चूंकि अध्यादेश 'मौजूदा ट्रस्ट डीड' का संदर्भ देता है, इसलिए यह वर्तमान नियुक्तियों पर भी लागू होना चाहिए।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या महाराष्ट्र सरकार इस अध्यादेश पर कोई और स्पष्टीकरण जारी करती है या मामला अदालत की चौखट तक पहुंचता है।